धार्मिक मान्यता है कि इस अवधि में किए गए श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान से पितरों को संतुष्टि मिलती है और परिवार पर उनका आशीर्वाद बना रहता है। यही वजह है कि देशभर में लाखों लोग इस दौरान विशेष धार्मिक अनुष्ठान करते हैं।
पितृ पक्ष का क्या है महत्व?
सनातन परंपरा में पितृ पक्ष को कृतज्ञता और स्मरण का पर्व माना जाता है। मान्यता है कि इस दौरान पूर्वजों का आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए श्राद्ध कर्म किया जाता है। लोग अपनी क्षमता के अनुसार दान-पुण्य, ब्राह्मण भोजन और तर्पण भी करते हैं।
कई श्रद्धालु गया, प्रयागराज, वाराणसी और हरिद्वार जैसे तीर्थ स्थलों पर जाकर पिंडदान और अन्य धार्मिक अनुष्ठान भी संपन्न कराते हैं।
पितृ पक्ष 2026 की प्रमुख तिथियां
- 27 सितंबर – प्रतिपदा श्राद्ध
- 28 सितंबर – द्वितीया श्राद्ध
- 29 सितंबर – तृतीया श्राद्ध
- 30 सितंबर – चतुर्थी और पंचमी श्राद्ध
- 1 अक्टूबर – षष्ठी श्राद्ध
- 2 अक्टूबर – सप्तमी श्राद्ध
- 3 अक्टूबर – अष्टमी श्राद्ध
- 4 अक्टूबर – नवमी श्राद्ध
- 5 अक्टूबर – दशमी श्राद्ध
- 6 अक्टूबर – एकादशी श्राद्ध
- 7 अक्टूबर – द्वादशी श्राद्ध
- 8 अक्टूबर – त्रयोदशी श्राद्ध
- 9 अक्टूबर – चतुर्दशी श्राद्ध
- 10 अक्टूबर – सर्वपितृ अमावस्या
सर्वपितृ अमावस्या का विशेष महत्व
पितृ पक्ष का अंतिम दिन सर्वपितृ अमावस्या के रूप में मनाया जाता है। जिन लोगों को अपने पूर्वजों की मृत्यु तिथि की जानकारी नहीं होती या जो किसी कारणवश निर्धारित तिथि पर श्राद्ध नहीं कर पाते, वे इस दिन सभी पितरों का श्राद्ध कर सकते हैं।
धार्मिक दृष्टि से यह दिन पितृ पक्ष का सबसे महत्वपूर्ण दिन माना जाता है और बड़ी संख्या में श्रद्धालु इस अवसर पर तर्पण और दान-पुण्य करते हैं।
इन नियमों का रखें ध्यान
पितृ पक्ष के दौरान सात्विक भोजन, संयमित जीवनशैली और धार्मिक कार्यों को विशेष महत्व दिया जाता है। मान्यता है कि इस अवधि में पूर्वजों का स्मरण करने और जरूरतमंदों को दान देने से पुण्य की प्राप्ति होती है।
कल से शुरू हो रहे पितृ पक्ष को लेकर देशभर के मंदिरों और तीर्थ स्थलों पर तैयारियां भी तेज हो गई हैं। श्रद्धालु अपने पितरों की शांति और मोक्ष की कामना के साथ धार्मिक अनुष्ठानों में शामिल होंगे।