UPSC Centenary: ‘सरकार माई-बाप नहीं’, पीएम मोदी ने बताया सिविल सेवा में भर्ती का आधार, बोले- देश और नागरिक पहले

पीएम मोदी ने कहा- सिविल सेवा में चयन के लिए सिर्फ ज्ञान नहीं, सेवा भावना भी जरूरी; ‘देश पहले और नागरिक पहले’ को बताया प्रमुख कसौटी

UPSC Centenary: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गुरुवार को नई दिल्ली के भारत मंडपम में संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) के शताब्दी समारोह में हिस्सा लिया। इस मौके पर उन्होंने आयोग की 100 साल की यात्रा, उसकी विश्वसनीयता और बदलते भारत में सिविल सेवाओं की भूमिका पर बात की। प्रधानमंत्री ने कहा कि यूपीएससी की एक सदी की यात्रा केवल किसी संस्था की उपलब्धि नहीं है, बल्कि यह उन लाखों युवाओं की आकांक्षाओं से भी जुड़ी है, जो हर वर्ष सार्वजनिक सेवा में जाने का सपना देखते हैं।

100 साल बाद भी कायम है UPSC पर भरोसा

प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि एक सदी के दौरान कई पीढ़ियां बदलीं, सरकारी व्यवस्थाओं और तकनीक में बदलाव आया और परीक्षाओं के पाठ्यक्रम भी बदले, लेकिन यूपीएससी के प्रति लोगों का विश्वास बना रहा। उन्होंने इसे आयोग की बड़ी पूंजी बताया।

UPSC की स्थापना 1 अक्टूबर 1926 को हुई थी। शुरुआत में यह एक सलाहकारी निकाय के तौर पर अस्तित्व में आया था। समय के साथ इसकी भूमिका और संवैधानिक स्थिति विकसित हुई और आज यह संविधान के तहत काम करने वाला स्वतंत्र निकाय है।

शताब्दी समारोह के दौरान प्रधानमंत्री ने यूपीएससी की 100 साल की यात्रा से जुड़ा स्मारक सिक्का और डाक टिकट भी जारी किया। इसके अलावा ‘100 Landmark Judgements- Shaping the Policies of UPSC and Public Service Commissions in India’ नामक पुस्तक का भी विमोचन किया गया।

सुभाष चंद्र बोस का किया जिक्र

अपने संबोधन में प्रधानमंत्री ने नेताजी सुभाष चंद्र बोस का भी उल्लेख किया। उन्होंने यूपीएससी की ऐतिहासिक यात्रा से जुड़ी प्रदर्शनी का जिक्र करते हुए कहा कि 1920 के दौर में सुभाष चंद्र बोस भी इसी तरह की चयन प्रक्रिया से गुजरे थे।

प्रधानमंत्री ने बताया कि उस समय अंग्रेजों का शासन होने के बावजूद परीक्षा में संस्कृत जैसे विषय शामिल थे और सुभाष चंद्र बोस ने संस्कृत का पेपर दिया था। इस संदर्भ के जरिए उन्होंने यूपीएससी से जुड़ी ऐतिहासिक विरासत की ओर ध्यान दिलाया।

सरदार पटेल को भी किया याद

पीएम मोदी ने आजादी के बाद प्रशासनिक व्यवस्था के निर्माण में सरदार वल्लभभाई पटेल की भूमिका को भी रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि आजादी मिलने के बाद चुनौती सिर्फ देश को स्वतंत्र बनाए रखने की नहीं थी, बल्कि नए राष्ट्र को चलाने और उसके पुनर्निर्माण की भी थी।

प्रधानमंत्री के मुताबिक, राष्ट्र निर्माण के लिए जिस प्रशासनिक और कौशल आधारित ढांचे की आवश्यकता थी, उसे मजबूत करने में सरदार पटेल की महत्वपूर्ण भूमिका रही। उन्होंने स्वतंत्र भारत में सिविल सेवाओं को एक प्रमुख आधार के रूप में विकसित करने पर जोर दिया।

‘देश पहले, नागरिक पहले’ होगा चयन का आधार

प्रधानमंत्री मोदी ने सिविल सेवाओं में युवाओं की भर्ती के तरीके को लेकर भी अपना दृष्टिकोण रखा। उन्होंने कहा कि आने वाली पीढ़ी के अधिकारी विकसित भारत के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे और उन्हें ऐसी सेवा भावना के साथ चुना जाना चाहिए, जिसमें देश और नागरिक सर्वोच्च प्राथमिकता पर हों।

उन्होंने दो कसौटियों का उल्लेख किया—‘देश पहले’ और ‘नागरिक पहले’। प्रधानमंत्री के अनुसार, सिविल सेवा में होने वाली प्रत्येक नियुक्ति को इन दोनों मानकों पर परखा जाना चाहिए।

उन्होंने यह भी कहा कि भर्ती परीक्षा का उद्देश्य सिर्फ यह पता लगाना नहीं होना चाहिए कि उम्मीदवार कितना जानता है। यह भी समझना जरूरी है कि वह सार्वजनिक सेवा में क्यों आना चाहता है और उसके भीतर लोगों की सेवा करने की भावना कितनी है।

‘सरकार माई-बाप नहीं, नागरिक देवो भव’

प्रधानमंत्री ने प्रशासन की पुरानी कार्यशैली और मौजूदा नागरिक-केंद्रित दृष्टिकोण के बीच अंतर का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि एक दौर ऐसा था जब यह धारणा प्रचलित थी कि सरकार ही ‘माई-बाप’ है। इसके विपरीत आज नागरिकों को केंद्र में रखकर काम करने की जरूरत है।

उन्होंने ‘नागरिक देवो भव’ को सेवा का मंत्र बताते हुए कहा कि नागरिकों की सेवा सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए। पीएम मोदी ने कहा कि 21वीं सदी का भारत नई कार्य-संस्कृति के साथ आगे बढ़ रहा है और प्रशासन में ऐसे पेशेवरों की आवश्यकता है, जो गरीबों की समस्याओं और देश की वास्तविक जरूरतों को समझ सकें।

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भर्ती प्रक्रिया में लगातार सुधार पर जोर

UPSC के शताब्दी समारोह के दौरान परीक्षा और भर्ती व्यवस्था को भविष्य की जरूरतों के अनुरूप विकसित करने पर भी चर्चा हुई। आयोग के अध्यक्ष डॉ. अजय कुमार ने भी उम्मीदवारों में केवल जानकारी याद रखने की क्षमता के बजाय तर्क, परिस्थितियों में निर्णय लेने और अस्पष्ट स्थिति में सोचने जैसी क्षमताओं के आकलन पर जोर दिया है। आयोग ने परीक्षा प्रक्रिया में तकनीक के इस्तेमाल को भी बढ़ाया है।

UPSC की 100 साल की यात्रा ऐसे समय में पूरी हुई है, जब देश की प्रशासनिक जरूरतें तेजी से बदल रही हैं। शताब्दी समारोह में संस्थागत विरासत के साथ भविष्य की सिविल सेवा को अधिक पारदर्शी, तकनीक-सक्षम और नागरिक केंद्रित बनाने पर भी जोर दिया गया।

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