Sonia Gandhi Voter List Case: नागरिकता से पहले वोटर लिस्ट में नाम कैसे आया? कोर्ट ने बदला पुराना फैसला, 6 नवंबर को सुनवाई
1980 में मतदाता सूची में नाम दर्ज होने और 1983 में नागरिकता मिलने से जुड़े आरोपों पर मजिस्ट्रेट कोर्ट नए सिरे से विचार करेगी।
Sonia Gandhi Voter List Case: कांग्रेस की वरिष्ठ नेता सोनिया गांधी के मतदाता सूची में नाम दर्ज होने से जुड़ा मामला एक बार फिर अदालत पहुंच गया है। दिल्ली की राउज एवेन्यू कोर्ट में बुधवार, 28 अक्टूबर को इस मामले की सुनवाई होनी थी, लेकिन वकीलों की हड़ताल के कारण कार्यवाही नहीं हो सकी। अब अदालत ने अगली सुनवाई के लिए 6 नवंबर की तारीख तय की है।
यह मामला इस आरोप से जुड़ा है कि सोनिया गांधी का नाम वर्ष 1980 में मतदाता सूची में दर्ज किया गया था, जबकि उन्हें भारतीय नागरिकता 30 अप्रैल 1983 को मिली थी। शिकायतकर्ता और वकील विकास त्रिपाठी ने सवाल उठाया है कि नागरिकता मिलने से पहले उनका नाम मतदाता सूची में कैसे शामिल हुआ। हालांकि, ये शिकायत में लगाए गए आरोप हैं और अदालत ने अभी तक मामले में कोई अंतिम निष्कर्ष नहीं दिया है।
सत्र न्यायालय ने क्यों पलटा मजिस्ट्रेट कोर्ट का फैसला?
इस मामले में पहले मजिस्ट्रेट अदालत ने सोनिया गांधी के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराने की मांग वाली शिकायत खारिज कर दी थी। शिकायतकर्ता विकास त्रिपाठी ने इस फैसले को चुनौती देते हुए सत्र न्यायालय का रुख किया।
21 सितंबर 2026 को विशेष न्यायाधीश विशाल गोगने ने पुनरीक्षण याचिका स्वीकार करते हुए मजिस्ट्रेट अदालत का पुराना आदेश रद्द कर दिया। अदालत ने कहा कि पुराने आदेश में शिकायत खारिज करने के पर्याप्त कारण स्पष्ट नहीं किए गए थे। इसके बाद मामले को नए सिरे से विचार करने के लिए मजिस्ट्रेट अदालत में वापस भेज दिया गया।
इस फैसले का मतलब यह नहीं है कि सोनिया गांधी के खिलाफ लगाए गए आरोप साबित हो गए हैं या उनके खिलाफ एफआईआर दर्ज करने का अंतिम आदेश दे दिया गया है। सत्र न्यायालय ने केवल यह निर्देश दिया कि शिकायत पर कानून के अनुसार दोबारा विचार किया जाए और उचित कारणों के साथ आदेश पारित किया जाए। रिपोर्ट पढ़ें।
1980 में नाम जुड़ने, 1982 में हटने और 1983 में दोबारा शामिल होने का आरोप
शिकायतकर्ता विकास त्रिपाठी के मुताबिक, सोनिया गांधी का नाम नई दिल्ली संसदीय क्षेत्र की मतदाता सूची में 1980 में शामिल हुआ था। शिकायत में दावा किया गया है कि उनका नाम 1982 में सूची से हटा दिया गया और 1983 में फिर से जोड़ दिया गया।
शिकायतकर्ता ने इस क्रम पर सवाल उठाते हुए संबंधित दस्तावेजों की जांच की मांग की है। उनका कहना है कि जब सोनिया गांधी को भारतीय नागरिकता अप्रैल 1983 में मिली, तो इससे पहले मतदाता सूची में नाम दर्ज किए जाने का आधार स्पष्ट होना चाहिए।
शिकायत में सफदरजंग रोड, नई दिल्ली के पते का भी उल्लेख किया गया है। हालांकि, इन दावों की पुष्टि और दस्तावेजों की प्रामाणिकता पर अंतिम फैसला होना बाकी है। अदालत में पेश किए गए रिकॉर्ड और संबंधित अधिकारियों की रिपोर्ट के आधार पर ही आगे की कानूनी प्रक्रिया तय होगी।
पुराने आदेश में क्या कमी बताई गई?
सत्र न्यायालय ने अपने आदेश में कहा था कि मजिस्ट्रेट अदालत ने शिकायत खारिज करते समय पर्याप्त कारण दर्ज नहीं किए। शिकायतकर्ता की ओर से प्रस्तुत मतदाता सूची से संबंधित दस्तावेजों की फोटोकॉपी की प्रामाणिकता पर सवाल था, लेकिन सत्र न्यायालय के मुताबिक, इस आधार पर शिकायत खारिज करने के पीछे पर्याप्त कानूनी कारण स्पष्ट करना जरूरी था।
अदालत ने यह भी कहा कि पुराने आदेश में इस सवाल पर पर्याप्त विचार नहीं किया गया कि शिकायत में लगाए गए आरोपों से कोई संज्ञेय अपराध बनता है या नहीं। इसी तरह, संबंधित पुलिस अधिकारी का पक्ष सुनने और पुलिस से स्टेटस रिपोर्ट मंगाने की प्रक्रिया पर भी सवाल उठाए गए।
सत्र न्यायालय ने नागरिकता और केंद्र सरकार तथा चुनाव आयोग के अधिकार क्षेत्र से जुड़ी कुछ टिप्पणियों को भी उचित नहीं माना। अदालत का कहना था कि शिकायत पर विचार करते समय यह स्पष्ट होना चाहिए कि आरोपों की जांच आवश्यक है या नहीं और कानून के तहत आगे क्या कार्रवाई की जा सकती है।
अब मजिस्ट्रेट अदालत में क्या होगा?
मामला अब अतिरिक्त मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट विनोद जोशी की अदालत में है, जहां सांसदों और विधायकों से जुड़े मामलों की सुनवाई होती है। अदालत को अब शिकायत पर नए सिरे से विचार करना है।
इसके लिए संबंधित पुलिस अधिकारी से स्टेटस रिपोर्ट मांगी जा सकती है और उनका पक्ष सुनने के बाद अदालत यह तय करेगी कि शिकायत पर आगे किस तरह की कार्रवाई की जानी चाहिए। कानून के मुताबिक, अदालत को अपने आदेश में यह स्पष्ट करना होगा कि उपलब्ध सामग्री और आरोपों के आधार पर आगे जांच या अन्य कानूनी प्रक्रिया की जरूरत बनती है या नहीं।
वकीलों की हड़ताल के कारण 28 अक्टूबर की सुनवाई टल गई। अब इस मामले में अगली सुनवाई 6 नवंबर को होगी। उस दिन होने वाली कार्यवाही से यह स्पष्ट हो सकता है कि अदालत शिकायत पर आगे किस दिशा में बढ़ती है।
क्या नागरिकता से पहले मतदाता सूची में नाम दर्ज हो सकता है?
भारतीय चुनाव कानून के तहत मतदाता के रूप में पंजीकरण के लिए भारतीय नागरिक होना जरूरी है। इसी कानूनी पहलू के आधार पर शिकायतकर्ता ने सोनिया गांधी के नाम की कथित प्रविष्टि पर सवाल उठाया है। लेकिन किसी पुराने मतदाता रिकॉर्ड में नाम दर्ज होने के आरोप और उस प्रविष्टि में कानूनी अनियमितता साबित होना दो अलग बातें हैं।
अदालत को शिकायत में लगाए गए आरोपों, उपलब्ध दस्तावेजों, उनकी प्रामाणिकता और संबंधित अधिकारियों की रिपोर्ट पर विचार करना होगा। अभी तक इस मामले में कोई अंतिम न्यायिक निष्कर्ष सामने नहीं आया है।
इसलिए फिलहाल इस प्रकरण को सोनिया गांधी के खिलाफ साबित हुए अपराध के तौर पर नहीं, बल्कि मतदाता सूची में नाम दर्ज होने से जुड़ी शिकायत और उसकी दोबारा न्यायिक समीक्षा के रूप में देखना चाहिए। 6 नवंबर की सुनवाई में अदालत का अगला कदम इस मामले की आगे की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण होगा।



