Preeti Adani: डॉ. प्रीति अदाणी ने वाराणसी में बताया प्राचीन ज्ञान का महत्व, बोलीं- विरासत वह है जो अगली पीढ़ी के भीतर छोड़कर जाते हैं

वाराणसी में आयोजित विश्व संगोष्ठी में डॉ. प्रीति अदाणी ने आधुनिक चुनौतियों के समाधान में भारतीय ज्ञान परंपरा, सेवा, सामाजिक जिम्मेदारी और सतत विकास की भूमिका पर विचार रखे।

Preeti Adani: उत्तर प्रदेश की धार्मिक और सांस्कृतिक नगरी वाराणसी में 2 नवंबर 2026 को आयोजित विश्व संगोष्ठी में अदाणी फाउंडेशन की चेयरपर्सन डॉ. प्रीति अदाणी ने आधुनिक चुनौतियों के समाधान में प्राचीन ज्ञान की भूमिका पर विस्तार से अपने विचार रखे। उन्होंने कहा कि भारत की प्राचीन परंपराएं केवल अतीत की धरोहर नहीं हैं, बल्कि आज की दुनिया को दिशा देने की क्षमता भी रखती हैं। योग, मोटे अनाज, भारतीय दर्शन और सेवा की भावना इसके उदाहरण हैं। उनके मुताबिक, ज्ञान तभी वास्तविक रूप से उपयोगी बनता है, जब उसका इस्तेमाल समाज की समस्याओं को दूर करने और लोगों का जीवन बेहतर बनाने के लिए किया जाए।

अपने संबोधन की शुरुआत में डॉ. प्रीति अदाणी ने वाराणसी की आध्यात्मिक और सांस्कृतिक विरासत का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि काशी ऐसा शहर है, जहां की आध्यात्मिक ऊर्जा इंसान को कुछ पल ठहरकर अपने भीतर झांकने का अवसर देती है। मंदिरों की घंटियों की गूंज, मां गंगा की शांति और यहां की प्राचीन परंपराएं इस शहर को विशेष बनाती हैं। उन्होंने कहा कि आधुनिक चुनौतियों के समाधान में प्राचीन ज्ञान पर चर्चा के लिए वाराणसी से अधिक उपयुक्त स्थान की कल्पना करना मुश्किल है।

भारतीय परंपराओं में छिपे हैं आधुनिक समस्याओं के समाधान

डॉ. प्रीति अदाणी ने कहा कि वाराणसी सदियों से आध्यात्मिक चिंतन और ज्ञान का केंद्र रहा है। भगवान बुद्ध और गुरु नानक जी ने भी इस पावन धरती से अपने उपदेश दिए। वहीं, जैन धर्म के चार तीर्थंकरों का जन्म भी इसी क्षेत्र में हुआ। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र के रूप में वाराणसी के बदलते स्वरूप का भी उल्लेख किया और कहा कि आज यह शहर विभिन्न संस्कृतियों के मिलन तथा दुनिया में भारत की बढ़ती पहचान का प्रतीक बन रहा है।

उन्होंने कहा कि भारत की परंपराएं केवल इतिहास में दर्ज रहने के लिए नहीं हैं, बल्कि आधुनिक जीवन की समस्याओं का समाधान खोजने में भी उनकी महत्वपूर्ण भूमिका हो सकती है। योग इसका प्रमुख उदाहरण है, जिसे आज पूरी दुनिया ने मन और शरीर के बीच संतुलन बनाए रखने के एक प्रभावी माध्यम के रूप में स्वीकार किया है। इसी तरह, मोटा अनाज यानी मिलेट्स, जो कभी भारतीय खान-पान का अहम हिस्सा था, आज पोषण, खाद्य सुरक्षा और जलवायु परिवर्तन जैसी वैश्विक चुनौतियों से जुड़ी चर्चाओं में महत्वपूर्ण स्थान हासिल कर रहा है।

उन्होंने स्पष्ट किया कि किसी ज्ञान का महत्व केवल उसके प्राचीन होने से तय नहीं होता। उसकी वास्तविक उपयोगिता इस बात में है कि वह वर्तमान समय की समस्याओं का समाधान करने में कितना मददगार साबित होता है।

‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ और मानवता की साझा जिम्मेदारी

अपने संबोधन में डॉ. प्रीति अदाणी ने दुनिया की अलग-अलग सभ्यताओं और दार्शनिक परंपराओं का उल्लेख करते हुए कहा कि मानवता के सामने कुछ सवाल ऐसे हैं, जो हजारों साल पहले भी प्रासंगिक थे और आज भी हैं। इनमें सबसे महत्वपूर्ण सवाल है कि मनुष्य के दुखों का कारण क्या है और उन्हें कम करने के लिए किस तरह के बदलाव जरूरी हैं।

उन्होंने अरस्तू, भगवान बुद्ध और कन्फ्यूशियस के विचारों का उल्लेख किया। साथ ही भारत के महाउपनिषद में दिए गए ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ के विचार को भी साझा किया, जिसका अर्थ है कि पूरी दुनिया एक परिवार है। उन्होंने कहा कि इन सभी परंपराओं में एक समान संदेश मिलता है कि जैसे-जैसे इंसान की क्षमताएं बढ़ती हैं, वैसे-वैसे उसकी जिम्मेदारियां भी बढ़नी चाहिए।

डॉ. अदाणी के मुताबिक, ज्ञान हमें दुनिया को बदलने की शक्ति देता है, लेकिन विवेक यह समझने में मदद करता है कि उस बदलाव को सही दिशा में कैसे ले जाना है। इसलिए भारत के लिए अपनी सभ्यतागत और सांस्कृतिक विरासत को सुरक्षित रखना बेहद जरूरी है।

भारत नॉलेज ग्राफ पहल के लिए एक करोड़ डॉलर से अधिक का संकल्प

भारतीय ज्ञान परंपरा के संरक्षण की बात करते हुए डॉ. प्रीति अदाणी ने अदाणी समूह की भारत नॉलेज ग्राफ पहल का भी जिक्र किया। उन्होंने बताया कि इस पहल के लिए समूह ने एक करोड़ डॉलर से अधिक की राशि देने की प्रतिबद्धता जताई है। इसका उद्देश्य भारत की सभ्यतागत और प्राचीन ज्ञान परंपरा को गहन और बहुविषयक शोध के लिए सुलभ बनाना है। इसके तहत 14 शोधार्थियों को पीएचडी करने में भी सहयोग दिया जा रहा है।

उन्होंने कहा कि इस पहल का उद्देश्य केवल प्राचीन ग्रंथों और शास्त्रों को डिजिटल रूप में सुरक्षित रखना नहीं है। ज्ञान तभी जीवित रहता है, जब उसका अध्ययन किया जाए, उस पर सवाल उठाए जाएं और समय के अनुसार उसकी नई व्याख्या की जाए। इसके लिए शैक्षणिक संस्थानों और वैश्विक सम्मेलनों में संवाद जरूरी है, ताकि प्राचीन ज्ञान आने वाली पीढ़ियों के लिए भी उपयोगी बना रहे।

सेवा को बताया उद्देश्यपूर्ण जीवन का आधार

अपने विचारों को आगे बढ़ाते हुए डॉ. अदाणी ने कहा कि आधुनिक तकनीक और आर्थिक प्रगति के बावजूद दुनिया आज भी असमानता, संघर्ष और पर्यावरण असंतुलन जैसी चुनौतियों से जूझ रही है। उन्होंने चिकित्सा शिक्षा और सामाजिक कार्यों के अनुभव साझा करते हुए कहा कि प्रगति को हमेशा मानवीय पैमानों पर मापा जाना चाहिए।

उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि दुनिया का सबसे अच्छा अस्पताल बनाना पर्याप्त नहीं है, बल्कि यह देखना जरूरी है कि वहां पहुंचने वाले मरीजों को उम्मीद और बेहतर होने का भरोसा मिलता है या नहीं। इसी तरह, एक बेहतरीन स्कूल की सफलता इस बात में है कि वहां पढ़ने वाली किसी परिवार की पहली पीढ़ी की बच्ची अपने भविष्य को लेकर आत्मविश्वास महसूस कर सके।

डॉ. प्रीति अदाणी ने बताया कि अदाणी फाउंडेशन वर्ष 1996 से सामाजिक विकास के क्षेत्र में काम कर रहा है। उनके अनुसार, फाउंडेशन 22 राज्यों के 7,000 से अधिक गांवों में सक्रिय है और हर साल 1.3 करोड़ से अधिक लोगों के जीवन पर इसका सकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है। उन्होंने कहा कि इन आंकड़ों के पीछे महिलाओं के आत्मनिर्भर बनने, बच्चों के बेहतर भविष्य के सपने देखने और परिवारों के जीवन में बदलाव आने जैसी अनेक कहानियां हैं।

उन्होंने सेवा का अर्थ बताते हुए कहा कि इसका मतलब केवल दूर रहकर किसी को कुछ दे देना नहीं है, बल्कि लोगों की बात सुनना, उनके साथ खड़ा होना और उन्हें अपना भविष्य संवारने के लिए सक्षम बनाना है।

गौतम अदाणी के 60वें जन्मदिन पर 6 अरब डॉलर से अधिक के सामाजिक योगदान का संकल्प

डॉ. अदाणी ने अपने संबोधन में परिवार से जुड़ा एक निजी प्रसंग भी साझा किया। उन्होंने बताया कि जब उनके पति गौतम अदाणी 60 वर्ष के हुए, तब परिवार ने उनसे पूछा कि वे जन्मदिन पर क्या उपहार चाहते हैं। इस अवसर पर ‘सेवा ही साधना है’ की भावना से प्रेरित होकर परिवार ने समाज कल्याण के लिए 6 अरब डॉलर से अधिक की राशि देने का संकल्प लिया।

उन्होंने कहा कि किसी बड़े सामाजिक संकल्प का मूल्य केवल उसकी घोषणा से नहीं आंका जाना चाहिए। असली महत्व इससे पैदा होने वाले अवसरों, लोगों को मिलने वाले सम्मान और ऐसी संस्थाओं के निर्माण में है, जो लंबे समय तक समाज की सेवा कर सकें। उन्होंने यह भी कहा कि कारोबार से सरप्लस तैयार करने जितना ही संतोष समाज की सेवा करने से मिलता है।

सतत विकास और पर्यावरण संरक्षण पर दिया जोर

अपने संबोधन के अंतिम हिस्से में डॉ. प्रीति अदाणी ने भारत के सामने मौजूद गरीबी, कुपोषण, अशिक्षा और बुनियादी सुविधाओं की उपलब्धता जैसी चुनौतियों का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि वर्ष 2047 तक विकसित राष्ट्र बनने के लक्ष्य को हासिल करने के लिए बड़े स्तर पर बुनियादी ढांचे का विकास जरूरी है। इसके साथ ही पर्यावरण संरक्षण और सतत विकास को भी प्राथमिकता देनी होगी।

उन्होंने बताया कि अदाणी समूह ने ऊर्जा परिवर्तन और इंफ्रास्ट्रक्चर के क्षेत्र में 100 अरब डॉलर से अधिक के निवेश का संकल्प लिया है। गुजरात के खावड़ा में दुनिया के सबसे बड़े रिन्यूएबल एनर्जी पार्क का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि सस्टेनेबिलिटी केवल सालाना रिपोर्ट का हिस्सा नहीं होनी चाहिए, बल्कि इसे रोजमर्रा के कामकाज और फैसलों में उतारना जरूरी है।

डॉ. अदाणी ने धर्म की शिक्षा को भी सामाजिक और कारोबारी जिम्मेदारी से जोड़ते हुए कहा कि धर्म हमें स्वयं से पहले अपने कर्तव्य को रखने की सीख देता है। प्रगति के साथ समाज और धरती के प्रति जिम्मेदारी भी जुड़ी होती है।

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‘धन विरासत में मिल सकता है, लेकिन मूल्यों को जीवन में उतारना पड़ता है’

अपने संबोधन के समापन में डॉ. प्रीति अदाणी ने विरासत की परिभाषा को एक अलग दृष्टिकोण से समझाया। उन्होंने कहा कि विरासत केवल वह नहीं है, जो हम अगली पीढ़ी के लिए छोड़कर जाते हैं, बल्कि वह भी है जो हम उनके भीतर छोड़कर जाते हैं। इसमें संवेदनशीलता, करुणा, जिम्मेदारी, विनम्रता और सेवा का भाव शामिल है।

उन्होंने कहा, “धन विरासत में मिल सकता है, लेकिन मूल्यों को अपने जीवन में उतारना पड़ता है।” उद्देश्यपूर्ण जीवन का अर्थ बताते हुए उन्होंने कहा कि जो मिले, उसे कृतज्ञता के साथ स्वीकार करना चाहिए, जो बनाया जाए उसे जिम्मेदारी के साथ बनाना चाहिए और जो दिया जाए उसे विनम्रता के साथ देना चाहिए।

गंगा के निरंतर प्रवाह का उदाहरण देते हुए उन्होंने कामना की कि अतीत का ज्ञान भविष्य की प्रगति को सही दिशा दे, समृद्धि के साथ जिम्मेदारी का भाव गहरा हो और सफलता समाज के व्यापक हित में काम आए। दिवाली के अवसर पर उन्होंने सभी के अच्छे स्वास्थ्य, करुणा और शांति की कामना करते हुए अपने संबोधन का समापन “हर हर महादेव” के उद्घोष के साथ किया।

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