Sambhal Violence: संभल हिंसा केस में अफरोज को सुप्रीम कोर्ट से राहत, NSA के तहत हिरासत का आदेश रद्द; यूपी सरकार पर 10 लाख की लागत
Sambhal Violence: पुलिस कस्टडी में दर्ज कथित कबूलनामे को निवारक हिरासत का अकेला आधार नहीं माना जा सकता, जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस शील नागू की पीठ का फैसला
Sambhal Violence: संभल हिंसा मामले में आरोपी मुल्ला अफरोज को सुप्रीम कोर्ट से बड़ी कानूनी राहत मिली है। शीर्ष अदालत ने उसके खिलाफ राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA) के तहत जारी निवारक हिरासत के आदेश को रद्द कर दिया है। साथ ही उत्तर प्रदेश सरकार पर 10 लाख रुपये की लागत लगाई गई है। अदालत ने कहा कि पुलिस हिरासत में दिए गए कथित कबूलनामे को अपने आप में निवारक हिरासत का पर्याप्त आधार नहीं बनाया जा सकता।
मामले की सुनवाई जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस शील नागू की पीठ ने की। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निवारक हिरासत के लिए इस्तेमाल की गई सामग्री और पुलिस हिरासत में दिए गए कथित बयान की कानूनी स्थिति पर विचार किया।
पुलिस कस्टडी के बयान पर उठे सवाल
मामले में उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से अफरोज के खिलाफ NSA की कार्रवाई के लिए उपलब्ध सामग्री का सहारा लिया गया था। इसमें पुलिस हिरासत के दौरान दिया गया कथित कबूलनामा भी शामिल था।
सुप्रीम कोर्ट ने माना कि ऐसे कथित कबूलनामे को अकेले आधार बनाकर किसी व्यक्ति के खिलाफ निवारक हिरासत का आदेश जारी नहीं किया जा सकता। इसी आधार पर अदालत ने अफरोज की NSA हिरासत को रद्द कर दिया।
2024 में संभल में हुई थी हिंसा
यह मामला 24 नवंबर 2024 को संभल की शाही जामा मस्जिद के सर्वे के दौरान हुई हिंसा से जुड़ा है। अदालत के आदेश पर मस्जिद का सर्वे कराया गया था, जिसके विरोध में हिंसा भड़क गई थी। इस घटना में चार लोगों की मौत हुई थी।
अफरोज को इस हिंसा से जुड़े मामलों में आरोपी बनाया गया था। उपलब्ध अदालती रिकॉर्ड के मुताबिक, उसके खिलाफ संभल में दर्ज कई आपराधिक मामलों का उल्लेख भी कार्यवाही के दौरान किया गया था।
गिरफ्तारी के बाद मिली थी जमानत
अफरोज को जनवरी 2025 में गिरफ्तार किया गया था। करीब नौ महीने जेल में रहने के बाद उसे 9 सितंबर 2025 को इलाहाबाद हाईकोर्ट से जमानत मिली थी।
इसके बाद 13 अक्टूबर 2025 को उत्तर प्रदेश सरकार ने उसके खिलाफ NSA के तहत निवारक हिरासत का आदेश जारी किया और उसे दोबारा हिरासत में ले लिया गया। राज्य की ओर से इस कार्रवाई के पीछे सार्वजनिक व्यवस्था प्रभावित होने की आशंका समेत अन्य सामग्री का हवाला दिया गया था।
सुप्रीम कोर्ट तक कैसे पहुंचा मामला?
NSA के तहत हिरासत को चुनौती देते हुए अफरोज की ओर से सुप्रीम कोर्ट का रुख किया गया। उसकी ओर से दलील दी गई कि निवारक हिरासत के लिए केवल पुराने आपराधिक मामलों या पुलिस हिरासत में दिए गए कथित बयान को आधार नहीं बनाया जा सकता।
सुनवाई के दौरान रेखा बनाम तमिलनाडु और अमीना बेगम बनाम तेलंगाना जैसे सुप्रीम कोर्ट के पूर्व फैसलों का भी हवाला दिया गया। इन मामलों के जरिए निवारक हिरासत के लिए पर्याप्त सामग्री और संबंधित परिस्थितियों पर उचित विचार किए जाने की आवश्यकता पर जोर दिया गया।
यूपी सरकार पर क्यों लगी 10 लाख की लागत?
सुप्रीम कोर्ट ने NSA के तहत जारी हिरासत आदेश को रद्द करने के साथ उत्तर प्रदेश सरकार पर 10 लाख रुपये की लागत भी लगाई। अदालत ने निवारक हिरासत की शक्ति के इस्तेमाल को कानून के अनुरूप नहीं माना।
अदालत का फैसला इस सवाल पर केंद्रित रहा कि निवारक हिरासत जैसे मामले में प्रशासन के सामने पर्याप्त और कानूनी रूप से प्रासंगिक सामग्री होनी चाहिए। केवल पुलिस हिरासत में दिए गए कथित कबूलनामे को आधार बनाकर ऐसी कार्रवाई नहीं की जा सकती।
हाईकोर्ट के आदेश पर भी पड़ा असर
इस मामले में पहले इलाहाबाद हाईकोर्ट ने NSA के तहत हिरासत को बरकरार रखा था। सुप्रीम कोर्ट ने अब उस स्थिति को पलटते हुए निवारक हिरासत का आदेश रद्द कर दिया है।
इस फैसले के साथ सुप्रीम कोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि निवारक हिरासत की कार्रवाई के लिए इस्तेमाल की गई सामग्री की कानूनी वैधता और पर्याप्तता महत्वपूर्ण है। पुलिस कस्टडी में दर्ज कथित कबूलनामे को अकेले आधार बनाकर NSA लागू नहीं किया जा सकता।



