Prashant Bhushan: ‘सत्ता परिवर्तन’ की बात पर प्रशांत भूषण के समर्थन में उतरी कांग्रेस, सुखदेव भगत ने गांधी के आंदोलन याद दिलाए

Prashant Bhushan: कांग्रेस सांसद ने कहा- विरोध को सरकार किस नजरिए से देखती है, यह अलग बात है; संवैधानिक और गांधीवादी तरीके से आंदोलन करना लोकतंत्र का हिस्सा

Prashant Bhushan: वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण की सत्ता परिवर्तन संबंधी टिप्पणी को लेकर राजनीतिक बहस के बीच कांग्रेस सांसद सुखदेव भगत उनके समर्थन में सामने आए हैं। भगत ने महात्मा गांधी के स्वतंत्रता आंदोलनों का उदाहरण देते हुए कहा कि सरकार के खिलाफ संवैधानिक और गांधीवादी तरीके से आवाज उठाना लोकतांत्रिक व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा है। उन्होंने कहा कि किसी आंदोलन को लेकर सरकार का नजरिया अलग हो सकता है, लेकिन अपनी असहमति जाहिर करना और मांगों के समर्थन में शांतिपूर्ण तरीके से विरोध दर्ज कराना नागरिकों का लोकतांत्रिक अधिकार है।

लोहरदगा से कांग्रेस सांसद सुखदेव भगत ने कहा कि इतिहास में ऐसे कई उदाहरण मौजूद हैं, जब आंदोलनों को तत्कालीन सरकारों ने कानून-व्यवस्था के लिए चुनौती के रूप में देखा। उन्होंने महात्मा गांधी का उल्लेख करते हुए कहा कि जब भी गांधी ने अंग्रेजी शासन के खिलाफ आंदोलन शुरू किया, उन्हें गिरफ्तार किया गया या उनके आंदोलनों को कानून तोड़ने की कार्रवाई के तौर पर देखा गया। भगत के मुताबिक, किसी आंदोलन को लेकर सत्ता में बैठे लोगों की सोच और आंदोलन करने वालों का नजरिया अलग-अलग हो सकता है। आंदोलनकारी जहां अपनी मांगों और असहमति को सामने रखना चाहते हैं, वहीं सरकार उसे अपने दृष्टिकोण से देख सकती है।

उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में सरकार के फैसलों पर सवाल उठाना और नीतियों के खिलाफ अपनी बात रखना असामान्य नहीं है। कांग्रेस भी संवैधानिक और गांधीवादी तरीकों से सरकार के सामने अपना विरोध दर्ज करा रही है। भगत के अनुसार, जब कोई राजनीतिक दल, संगठन या नागरिक समूह किसी फैसले अथवा व्यवस्था के खिलाफ आंदोलन करता है, तो वह सरकार की नीतियों और निर्धारित व्यवस्था को चुनौती देता है। ऐसे में किसी विरोध को किस रूप में देखा जाएगा, यह काफी हद तक सरकार के दृष्टिकोण पर निर्भर करता है। उन्होंने अपने बयान के जरिए यह तर्क रखा कि विरोध और असहमति को केवल कानून-व्यवस्था के नजरिए से देखने के बजाय उसके पीछे उठाए जा रहे मुद्दों पर भी विचार किया जाना चाहिए।

प्रशांत भूषण ने सत्ता परिवर्तन को बताया था लोकतांत्रिक अधिकार

प्रशांत भूषण ने 15 अक्टूबर को मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर में कथित अनियमितताओं को लेकर मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ जारी प्रदर्शनों के बीच सत्ता परिवर्तन पर टिप्पणी की थी। उन्होंने कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के संस्थापक अभिजीत दीपके, छात्र संगठनों के नेताओं और कार्यकर्ताओं के साथ आयोजित एक प्रेसवार्ता में सरकार के खिलाफ असंतोष व्यक्त करने और सत्ता परिवर्तन की मांग उठाने के अधिकार पर अपनी बात रखी थी।

भूषण ने कहा था कि लोकतंत्र में सरकार के खिलाफ असंतोष पैदा करना अपने आप में कोई अपराध नहीं है। उन्होंने स्पष्ट किया था कि मौजूदा संघर्ष का उद्देश्य चुनाव प्रक्रिया को सही ढंग से संपन्न कराना है। हालांकि, उन्होंने यह भी कहा कि यदि इसी तरह की सख्ती जारी रहती है, तो सत्ता परिवर्तन की मांग और मजबूत हो सकती है। उन्होंने सत्ता परिवर्तन की इच्छा को लोकतांत्रिक अधिकार बताते हुए सवाल किया था कि यदि कोई नागरिक या समूह सरकार में बदलाव चाहता है, तो इसमें गलत क्या है।

प्रशांत भूषण की यह टिप्पणी ऐसे समय आई, जब एसआईआर की प्रक्रिया को लेकर कथित अनियमितताओं के आरोप लगाए जा रहे थे और मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ प्रदर्शन किए जा रहे थे। इस घटनाक्रम ने चुनाव प्रक्रिया, लोकतांत्रिक अधिकारों और सरकार के खिलाफ विरोध दर्ज कराने के तरीकों को लेकर बहस को और चर्चा में ला दिया।

भाजपा के आंदोलनों का भी किया था जिक्र

अपनी टिप्पणी में प्रशांत भूषण ने भारतीय जनता पार्टी के पुराने आंदोलनों का भी उल्लेख किया था। उन्होंने कहा था कि भाजपा ने भी अतीत में सत्ता परिवर्तन के उद्देश्य से कई आंदोलनों का नेतृत्व किया है। इसी संदर्भ में उन्होंने सत्ता परिवर्तन की मांग को साजिश के रूप में पेश किए जाने पर सवाल उठाया था।

भूषण की दलील थी कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में सरकार बदलने की मांग राजनीतिक प्रक्रिया का हिस्सा हो सकती है। उनके बयान के बाद इस बात पर चर्चा शुरू हुई कि सरकार के खिलाफ आंदोलन करने, चुनाव प्रक्रिया पर सवाल उठाने और सत्ता परिवर्तन की मांग रखने के बीच क्या संबंध है। इस पूरे मामले में एसआईआर को लेकर लगाए गए आरोप और विरोध प्रदर्शनों की पृष्ठभूमि भी महत्वपूर्ण बनी हुई है।

गांधीवादी आंदोलन का उदाहरण देकर कांग्रेस ने रखा पक्ष

कांग्रेस सांसद सुखदेव भगत ने प्रशांत भूषण की टिप्पणी का बचाव करते हुए स्वतंत्रता आंदोलन के दौर का उदाहरण दिया। महात्मा गांधी का हवाला देकर उन्होंने यह समझाने की कोशिश की कि सत्ता में बैठे लोगों और आंदोलन करने वालों के बीच किसी विरोध को लेकर अलग-अलग दृष्टिकोण हो सकते हैं। उनके मुताबिक, किसी आंदोलन को सरकार विरोधी गतिविधि के रूप में देखना और उसे लोकतांत्रिक असहमति के रूप में समझना दो अलग नजरिए हैं।

भगत के बयान का मुख्य आधार यह था कि लोकतंत्र में नागरिकों और राजनीतिक दलों को सरकार के फैसलों पर सवाल उठाने तथा अपनी मांगों को सामने रखने का अधिकार है। उन्होंने संवैधानिक और गांधीवादी तरीके से विरोध दर्ज कराने की बात पर जोर दिया। वहीं, प्रशांत भूषण की सत्ता परिवर्तन संबंधी टिप्पणी ने चुनाव प्रक्रिया को लेकर जारी विरोध के बीच राजनीतिक बहस को नया विषय दे दिया है।

इस पूरे घटनाक्रम में एक ओर एसआईआर में कथित अनियमितताओं को लेकर उठाए जा रहे सवाल हैं, तो दूसरी ओर सरकार के खिलाफ विरोध और सत्ता परिवर्तन की मांग को लेकर राजनीतिक बयानबाजी जारी है। सुखदेव भगत ने गांधी के आंदोलनों का उदाहरण देकर प्रशांत भूषण की टिप्पणी का बचाव किया है, जबकि भूषण ने अपनी बात रखते हुए सरकार के खिलाफ असहमति और सत्ता परिवर्तन की मांग को लोकतांत्रिक अधिकारों के संदर्भ में पेश किया था।

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