LR-AShM: भारत की हाइपरसोनिक मिसाइल से बढ़ेगी नौसेना की ताकत, 1,500 किमी दूर तक समुद्री लक्ष्य पर वार की क्षमता

LR-AShM: DRDO की LR-AShM मिसाइल विकास के उन्नत चरण में, 2027 से 2029 के बीच तैनाती की संभावना पर नजर।

LR-AShM:  भारत अपनी समुद्री सुरक्षा को मजबूत करने के लिए लंबी दूरी की हाइपरसोनिक एंटी-शिप मिसाइल LR-AShM विकसित कर रहा है। रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) की इस परियोजना का उद्देश्य भारतीय नौसेना की तटीय रक्षा क्षमता को बढ़ाना और समुद्र में मौजूद संभावित खतरों से निपटने के लिए नई तकनीक उपलब्ध कराना है।

रक्षा संबंधी रिपोर्टों में इस मिसाइल की मारक दूरी लगभग 1,500 किलोमीटर बताई गई है। इसे समुद्र में स्थिर और चलते हुए लक्ष्यों को निशाना बनाने के लिए डिजाइन किया गया है। हालांकि, मिसाइल की संभावित तैनाती और परिचालन में शामिल होने की तारीख परीक्षणों तथा संबंधित मंजूरियों पर निर्भर करेगी।

क्या है LR-AShM और कैसे काम करती है?

LR-AShM का पूरा नाम लॉन्ग रेंज एंटी-शिप हाइपरसोनिक मिसाइल है। यह हाइपरसोनिक ग्लाइड तकनीक पर आधारित हथियार प्रणाली है, जिसे भारतीय नौसेना की तटीय बैटरी संबंधी जरूरतों को ध्यान में रखकर विकसित किया जा रहा है।

DRDO के अनुसार, मिसाइल में दो चरणों वाला ठोस ईंधन रॉकेट मोटर सिस्टम इस्तेमाल किया गया है। शुरुआती चरणों में रॉकेट मोटर इसे आवश्यक गति प्रदान करते हैं। इसके बाद मिसाइल का ग्लाइड व्हीकल वायुमंडल में आगे बढ़ते हुए दिशा में जरूरी बदलाव कर सकता है और लक्ष्य की ओर जाता है।

इसकी तकनीक में स्वदेशी एवियोनिक्स और उच्च सटीकता वाले सेंसर भी शामिल हैं। इनका उद्देश्य उड़ान के अंतिम चरण में लक्ष्य की पहचान और उसे निशाना बनाने में मदद करना है।

मैक 10 तक की शुरुआती गति, ग्लाइड चरण में मैक 5

DRDO की ओर से उपलब्ध कराई गई जानकारी के मुताबिक, LR-AShM की गति शुरुआती चरण में मैक 10 तक पहुंच सकती है। इसके बाद ग्लाइड चरण में इसकी औसत गति करीब मैक 5 बताई गई है। मैक संख्या ध्वनि की गति के अनुपात को दर्शाती है, इसलिए वास्तविक गति परिस्थितियों के अनुसार बदल सकती है।

हाइपरसोनिक गति और उड़ान के दौरान दिशा बदलने की क्षमता के कारण ऐसी मिसाइलों का पता लगाना और उन्हें रोकना पारंपरिक रक्षा प्रणालियों के लिए चुनौतीपूर्ण हो सकता है। फिर भी, किसी मिसाइल को रोक पाना या उसका लक्ष्य तक पहुंचना कई परिस्थितियों पर निर्भर करता है। इसलिए यह दावा करना सही नहीं होगा कि कोई भी विरोधी युद्धपोत इसे रोक नहीं सकता।

पाकिस्तान और चीन के युद्धपोतों के लिए क्यों अहम मानी जा रही है?

हिंद महासागर क्षेत्र में भारत की समुद्री सुरक्षा के लिहाज से लंबी दूरी की एंटी-शिप मिसाइल महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। यदि LR-AShM परीक्षणों और मूल्यांकन के बाद नौसेना में शामिल होती है, तो यह तटीय रक्षा इकाइयों को समुद्र में दूर स्थित संभावित लक्ष्यों के खिलाफ कार्रवाई की क्षमता दे सकती है।

पाकिस्तान और चीन की नौसैनिक गतिविधियों के संदर्भ में भी ऐसी तकनीक को रणनीतिक महत्व वाला माना जा रहा है। हालांकि, किसी भी युद्धपोत को नष्ट करने की सफलता केवल मिसाइल की गति या दूरी से तय नहीं होती। लक्ष्य की स्थिति, पहचान प्रणाली, मार्गदर्शन, मौसम और विरोधी की रक्षा व्यवस्था भी परिणाम को प्रभावित करते हैं।

इसलिए “युद्धपोत सेकंडों में टारगेट बन जाएंगे” जैसी सुर्खियों को संभावित सैन्य क्षमता के संदर्भ में समझना चाहिए, न कि हर परिस्थिति में सुनिश्चित परिणाम के रूप में।

परीक्षणों के जरिए आगे बढ़ रहा मिसाइल कार्यक्रम

LR-AShM को जनवरी 2026 में गणतंत्र दिवस परेड के दौरान लॉन्चर के साथ सार्वजनिक रूप से प्रदर्शित किया गया था। इससे पहले नवंबर 2024 में भी इस प्रणाली का परीक्षण किया गया था। मई 2026 में ओडिशा तट के पास इसके एक और उड़ान परीक्षण की खबर आई थी। रिपोर्टों के मुताबिक, उस परीक्षण के दौरान मिसाइल की उड़ान से जुड़े आंकड़े एकत्र किए गए थे, जिनका विश्लेषण आगे की विकास प्रक्रिया के लिए महत्वपूर्ण है।

किसी मिसाइल को सेना में शामिल करने से पहले उसके अलग-अलग तकनीकी पहलुओं का परीक्षण किया जाता है। इसमें उड़ान की विश्वसनीयता, मार्गदर्शन, सेंसर और परिचालन जरूरतों के अनुरूप प्रदर्शन का मूल्यांकन शामिल हो सकता है। इसलिए सफल परीक्षण के बाद भी अंतिम तैनाती तक कई चरण पूरे करने होते हैं।

2027 से 2029 के बीच तैनाती की संभावना

मीडिया रिपोर्टों में LR-AShM को 2027 से 2029 के बीच सेवा में शामिल किए जाने की संभावना बताई गई है। हालांकि, इस समयसीमा को अंतिम और आधिकारिक तारीख नहीं माना जाना चाहिए। वास्तविक तैनाती परीक्षणों के परिणाम, सैन्य मूल्यांकन, उत्पादन की तैयारी और संबंधित मंजूरियों पर निर्भर करेगी।

उत्पादन क्षमता को लेकर भी कुछ रिपोर्टों में शुरुआती स्तर पर सालाना 10 से 15 मिसाइल बनाने और बाद में इसे बढ़ाने की संभावना का उल्लेख किया गया है। इन आंकड़ों की अंतिम आधिकारिक पुष्टि आवश्यक है।

स्वदेशी रक्षा तकनीक को मिलेगा बढ़ावा

LR-AShM जैसी परियोजनाएं भारत की स्वदेशी रक्षा तकनीक विकसित करने की कोशिश का हिस्सा हैं। हाइपरसोनिक उड़ान के लिए प्रणोदन, उच्च तापमान सहने वाली सामग्री, नियंत्रण प्रणाली और सटीक मार्गदर्शन जैसी जटिल तकनीकों की जरूरत होती है।

इन क्षेत्रों में घरेलू क्षमता बढ़ने से भविष्य में रक्षा अनुसंधान और उत्पादन को मदद मिल सकती है। भारतीय नौसेना के लिए इस मिसाइल का महत्व इस बात पर निर्भर करेगा कि परीक्षणों के बाद यह परिचालन जरूरतों को कितनी प्रभावी तरह पूरा करती है।

फिलहाल LR-AShM को विकास और परीक्षण के दौर से गुजर रही लंबी दूरी की स्वदेशी मिसाइल के रूप में देखना उचित है। इसकी वास्तविक परिचालन क्षमता और तैनाती की स्थिति आधिकारिक घोषणाओं से स्पष्ट होगी।

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